वहां उस कमरे में अब मैं नहीं रहता ।।।।।।।।।

दरारें बन गयीं हैं
सीलन फट चुकि है

मकड़ी की जाली लटकी रहती हैं ।।।
वहां उस कमरे में अब मैं नही रहता

एक टूटी हुई बोतल औंधे मुंह लेटी रहती है।
फटे हुए क़िताब के पन्ने  बिखरे पड़े हैं।।।।

एक बगल पलंग पर फटी हुई चादर , रुई के फ़ाहों के साथ झूल रहीं हैं।
उस  तरफ़ धूल की मोटी परत ने खिड़की के शीशों को ढंक दिया है।।।

दीवार पर टंगे फूटे आईने की काँच तिरछी हो गईं हैं ।।
लकड़ी के अलमारी पर मेरी पुरानी तस्वीर भी धुंधली नज़र आने लगी है ।।।।।।

टपकते हुए छत ने मरे हुए इंसान सी बू कमरे में घोल दि है।
कहीं कहीं कोने में काई की मोटी परत चढ़ गई है ।

दूसरे हिस्से में कुछ चिथड़े और लंबे सफ़र के बाद घिस चुकी चप्पल चुप चाप तमाशा देखते रहते हैं ।।। और
खिड़की के नीचे पुराना चाय वाला आठ बजे अब भी अपनी केतली समेट लेता है ।।।।पर.....

वहां उस कमरे में अब मैं नहीं रहता ।।।।।।।।।


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