आज आख़िरी शाम ढल गयी।।।
शीशे की खिड़की से झांकता हुआ सुर्ख़ सूरज
धीरे से सूखे हुए काले पेड़ के पीछे जा कर छुप गया।
हल्की हल्की रौशनी और हल्के हल्के अंधेरे के बीच
आज आख़िरी शाम ढल गयी ।।।
इस छोटे से वक़्त में न जाने मैंने क्या क्या समेट लिया है।
उस झोंपड़े की कड़क चाय, उस बूढ़े आदमी की आते जाते मुश्कुरहट
कच्चे सड़क के गड्ढे , पुराना जंग खाया हुआ ट्रक , हाथ मे रोटी लेकर स्कूल जाती हुई लड़की, और अथाह संन्नाटा......
अब बस आज आखिरी चांद आएगा , एक वीरान आसमान पर सफ़ेद तारों के साथ पूरा चांद ।।
और छोड़ जाएगा पीछे यादों का एक बड़ा सा बोरा ,
उस बोरे में कई कई चांद रातें सुलगती रहेंगी, कई किस्से हमेशा के लिये बंद ही जायँगे , कई हंसी हमेशा के लिये यहाँ दफ़न हो जाएंगी ।।
पर मैं ढ़ेर सारी यादों के साथ कई दिनों तक यहीं आस पास ही भटकता रहूंगा , और आज सब कुछ ख़ाली हो जाएगा जैसे ....
आज आख़िरी शाम ढल गयी।।।


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