दाहिने तरफ़ के कमरे में कुछ बदल गया है जैसे।.

दाहिने तरफ के कमरे में कुछ बदल गया है जैसे....
वहाँ चारों तरफ़ तुम महक रही हो

सफ़ेद फ़र्श पर तुम्हारे नंगे पैरों के छप्पे ,
शीशे के पास उलझे हुए बाल ,

चेहरा पोंछ कर टंगा हुआ उजला कपड़ा
और मेरे चश्मे पर पड़े हुए तुम्हारे  हाथों के निशान

सब महसूस कर सकता हूँ मैं
वहां अब मैं कम और तुम ज़्यादा हो गयी हो.....

शाम को जब सूरज मेरी खिड़की से नीचे जा रहा होता है ...
तो मेरे गालों पर तुम्हारी उंगलियों से बनती हुई लकीर ,
औऱ मेरी तरफ़ एक टक घूरती हुई तुम्हारी नज़रें।।।
ऐसा लगता है मानो कुछ तो कम है वहाँ अब...
पता नही क्या पर कुछ बेचैन सांसें कुछ बिखरे हुए कपड़े ,
एक कोने में पड़ी हुई तुम्हारी चप्पल और आईने पर पड़ी हुई

तुम्हारे भीगे बालों की कुछ बूंदें.........
दरवाज़े के पीछे से झाँकती मुस्कुराती हुई आंखें।।।

बिस्तर पड़ पड़ी हुई तुम्हारी अंगड़ाई ....
तुम्हारे बाहों की गर्माहट........और

मेरे गर्दन पर तुम्हारे नाख़ून के निशान
वहाँ सब जम गया है ...........लगता है।।।।।।।।

दाहिने तरफ़ के कमरे में कुछ बदल गया है जैसे।.

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