एक और दिन बीत गया शाम के ढले बग़ैर।।।।।।

एक और दिन बीत गया शाम के ढले बग़ैर।।।।
ठहर ठहर के आती रही आवज़ पूरे दिन ,

बिना पत्ते वाला पेड़ डटा रहा जस के तस ,
धूप भी खिल कर आई बीच बीच में,,,

दूर कोने में धान के फ़ाहों से धूल निकलती रही,
मश्गूल लोग दौड़ते रहे , औरतें लगीं रहीं खेतों में सुबकते हुए बच्चे पीठ पर टांगे ।।।।।

रह रह कर अज़ान की आवाज़ें तेज़ी से बीत रहे वक़्त बयां करते रहे ।।।
नीली चौखट पर एक बूढ़ा जोड़ा भरी हुई मुस्कान के साथ लीन रहे एक दूसरे के साथ ।।।।।।।

सब चल रहे थे एक मैं ठहरा हुआ था उन हलचल में सनन्नाटों का हाथ पकड़े ।।
बैठे बैठे .......

हल्के हल्के बादल के साथ ठण्ड बढ़ती रही ,
पर वहीं कहीं बीच में सुबह भी हुई थी , रात के सो जाने के बाद

उस हल्की सी सुनहरी धूप में थोड़ी सी दोपहर भी आई थी चहकते हुए ,
फिर अचनाक सब कुछ काले उजाले में बदल जाने लगा ।।।

मैं  बरबस ढूंढता रहा कुछ ......और देखो
एक और दिन बीत गया शाम के ढले बग़ैर।।।।।।

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