सड़क की टिमटिमाती लाइटे|||||||||||
शाम को जाब अँधेरा हो जाता है ............तब एक सुनसान सड़क से होता हुआ मैं घर लौटता हूँ |
उस सड़क पर हर तीसरी लाइट टिमटिमा रही होती है .....
मैं उन टिमटिमाती लाइटो से तेज़ी से गुज़र जाना चाहता हूँ |||||||||||||||
पर उन जलते बुझते लाइटो में ,इतना अँधेरा और इतनी रौशनी होती है की
वो बांकी सारी ठीक लाइटो की रौशनी भी छिपा देता है |
और वहां पर एक उजला अँधेरा पैदा हो जाता है ,
ठीक वैसा ही उजला अँधेरा जो|||||||||||||
जिन्दगी में हजारों रौशनी के बाद भी , एक टिमटिमाते हुए अँधेरे में छिप जाते हैं ................
मैं दौड़ कर इस रौशनी और अँधेरे के खेल से निकल जाना चाहता हूँ ,
पर वो मेरे आँखों को इतना चौंधिया देती है ,की मैं ...
अब किसी भी रौशनी से भयानक चिढ़ जाता हूँ |||||||||||||||
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