मैं धीरे धीरे तुमसे...............

मैं धीरे धीरे तुमसे अपनी छवी मिटा लूँगा |
पूरा साफ़ कर लूँगा खुद को तुम्हारे अन्दर से ,

और एक दिन मेरे स्वेटर के रोयें से भी मेरी महक उड़ जाएगी,
जिसे तुमने अपने कपड़ों के बीच दबा रखा है |

मैं एक दिन किताब में दबे हुए ,उस गुलाब से भी झड कर गिर जाऊंगा ,
जैसे उसकी कलियाँ हर रोज़ सूख कर झड रहीं हैं |

हाँ एक दिन मैं तुम्हारे कलम से भी खली हो जाऊंगा ,
जिससे तुम अपनी उँगलियों पर मेरा नाम लिखा करती हो |

और बस मैं उस पत्थर सा रह जाऊंगा ,
तुम्हारे मेज़ पर पड़ा हुआ -----बेज़ान,बेज़ुबान,बेमतलब

जिसे मेज़ साफ़ करते हुए , एक दिन कहीं बाहर फेंक आना --------तब देखना

मैं धीरे धीरे तुमसे अपनी छवी मिटा लूँगा |
पूरा साफ़ कर लूँगा खुद को तुम्हारे अन्दर से 

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