क्यूंकि यही कुछ उम्मीद है जो अब बंकि हैं तुमसे ..............

यूं ही बेख़याली में चलते चलते तुम उससे भी टकरा जाती होगी न ,

जब तुम शाम को संवर के टहलने निकलती होगी तो अब भी दुपट्टा तुम्हारा लहराता होगा ,
फिर उस तालाब के किनारे बैठे बैठे सारे किस्से तुम सुनाती होगी ,और

थक कर चूर हो जाती होगी तो कंधे पर उसके तुम अटक जाती होगी न ,
क्यूंकि यही कुछ उम्मीद है जो अब बंकि हैं तुमसे |||||||||

उन पुरानी तस्वीरों का क्या हुआ , जो तुमने शायद दफ़न कर दिया होगा, या
भूल गयी होगी किसी किताब में दबा कर ,

और मेरे लिखे खतों को जो तुमने जला दिया होगा या फाड़ कर छज्जे से गिरा दिया होगा कहीं,
क्यूंकि यही कुछ उम्मीद है जो अब बंकि हैं तुमसे |||||||||

बोलते बोलते अटक जाती हो तुम बताया की नहीं उसे , और
अपनी बचपन की सारी आदतें , तस्वीरें पुरानी , घर के किस्से भी बता दिया होगा न

अपने वही नखरे और गुस्सा भी तो दिखाती होगी उसे ,
फिर शाम के आते आते अजीब से ज़िद लेकर बैठ जाती होगी

क्यूंकि यही कुछ उम्मीद है जो अब बंकि हैं तुमसे |||||||||
उसे भी अपनी मासूमियत का दीवाना तो बना लिया होगा ,और

बेकरारी में वही वादे भी दुहराती होगी न ,
के हमेशा साथ देने का पुराना मटकता हुआ अंदाजा भी उसपर छिडक देती होगी , और

उसे भी अपने पन के ढोंग में कस लिया होगा न
क्यूंकि यही कुछ उम्मीद है जो अब बंकि हैं तुमसे |||||||||

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