एक मुद्दत बाद वो मेरे मैं उसके क़रीब था।।।।।
पर हालात ऐसे रहे कि मैं उसे छू भी न सका ।।।।
एक अंजान बड़ी भीड़ आयी , और मेरी बेचैन नज़रें ने मेरी उखड़ी उखड़ी साँसों से ज़रा धीमे
चलने को कहा ।।।
फ़िर ढूंढते ढूंढते उन हज़ार चेहरों मे
मैंने एक चेहरा पहचान लिया ।।।।।
मेरे क़दम बाबस्ता उसकी तरफ़ चलने लगे होठ ख़ुद बखुद मुस्कुराने लगे
और मेरी बाहें न जाने कैसे खुल गईं ।।।।
पर हालात ऐसे रहे कि मैं उसे छू भी न सका ।।।।
यूं तो हम बैठे रहे क़रीब एक दूसरे के
दोपहर की गरम धूप से लेकर शाम की सिरहन तक
उसकी हंसी से लेकर भीगी भीगी आंखों तक
जी चाहा भी की खिंच लू उसे अपनी तरफ़
और बताऊं उसे उसकी आँखों में देख कर
पर हालात ऐसे रहे कि मैं उसे छू भी न सका ।।।
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