कहानी बन जाती न

जो तुम कहती कुछ हल्के से, और कुछ मुश्कुरा देता मैं
        तो एक कहानी बन जाती न।।।।।।
एक ठोकर मेरे सीने पर देकर, फिर तुम खिलखिला देती,           हाँ चोट लगती पर
                         एक कहानी बन जाती न।।।।।।
कुछ बातें होती नई, कुछ पुरानी
कुछ यादें उखाड़े जाते गढ्डों से,
और कुछ पल गाड़ दिए जाते,
कुछ तुम होती वहां, कुछ मैं होता वहां
फिर इतना कुछ मिलकर
                          एक कहानी बन जाती न।।।।।।।
उस दिन की हंसी, और उस दिन के गुस्से को,
समेट कर अगर रख पाता, अपनी गठरी में, या
नहा कर आए हुए तुम्हारे उलझे बालों से,
टपकते हुए बूँदों को भर कर
  रख पाता अपनी हथेली में,   तो
            तुम एक ग़ज़ल हो जाती मेरी डायरी की, और
                            एक कहानी बन जाती न।।।।।।

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