कितनी खूबसूरत यादें हैं न




कितनी खूबसूरत यादें हैं न,


जहाँ तुम सफ़ेद कोहरे से लिपटी चली आ रही हो,
आकर अपने सर्द हाथ मेरे गलों से लगा रही हो |
जहाँ तुम पतले स्वेटर में मुझको गुस्सा दिला रही हो,

फिर ठण्ड का बहाना बना कर प्यार से मेरे बाँहों में समां रही हो |||
कितनी खूबसूरत यादें हैं न,


जहाँ तुम मोटे पेड़ से लग कर खेल रही हो..
मेरी उसी बेढंगी बात को दसवीं बार झेल रही हो,


जहाँ थक कर तुम मेरे कंधे से लग कर सो जाती हो
कुछ उट-पटांग सी जिद करती हो, खुद गुस्सा होती हो खुद मान जाती हो...
बातें आगे की कहती कहती थोडा रुक कर तुम रो जाती हो |||||||


कितनी खूबसूरत यादें है न,


जहाँ रोज़ शाम एक पहचानी सड़क पर तुम मेरे साथ चलती हो
टहलते टहलते तुम सूरज का रंग बदल देती हो...
फिर बातों बातों में तुम्हारा कमरा आ जाता है........



लाल सी रौशनी पर सरपट अँधेरा छा जाता है,
तुम धीरे धीरे उन अंधेरों में खो जाती हो..
पर खोने से पहले वो पलट कर मुझे देखना,
सच कहूँ तो वहीँ तुम मेरा आने वाला कल हो जाती हो |||||||||












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