चार और साल
चार और साल...........................
ज़रूरी तो नहीं हम तुम मुकम्मल हो जाएँ ..हमारी प्यास अधूरी भी तो रह सकती है|
ये और बात है की हम पूरे अच्छे लगते हों....पर अब साल का चौथा पडाव है, और बसंत अब
बालिग़ हो चुका है | साल के 19 और 24वें बसंत में कोई पुख्ता नहीं होता| बस अल्हड़
होतें है हम जैसे आधा-आधा सा सब कुछ आधी समझ, आधा अक्ल, आधी दुनियादारी, आधी
ज़िम्मा दारी,... हाँ तब एक चीज़ ज़रूर पूरा होता है, पूरा दिल और पूरी मोहब्बत| कुछ
आवारा दोस्त, तुम-मैं...पूरी-पूरी शाम ठहरी हुई ज़िन्दगी कम अक्ली की बातें, बेतहासा
ठहाकें और हँसते हँसते आखें भर आना| पर जब से ये सर्दी और बसंत बालिग़ हुए हैं,
पतझड़ सा आ गया है| शाम सूनी हो गयी है, दोस्त सलीकेदार, तुम सर्दी से खुश्क हो कर
जा रही हो और मैं तुमसे अलग हो कर बस धूल में ये जहाँ ढँक देना चाहता हूँ | लो मैं
बालिग़ हो कर झुलस जाता हूँ, तुम चाहती हो वो चाहते हैं, सब चाहते हैं, की मै तप कर
सोना बन जाऊं पर मैं सोना नहीं हूँ , एक आम पत्थर हूँ जो पानी में तैरते रहना
चाहता हूँ | इसलिए कभी-कभी मैं अपना आधापन बचा लेना चाहता हूँ ,जैसे दूसरे बसंत का
एक ख़त और उसमे लिपटी हुई वो सारी तस्वीर जो तुमने बेशक आधी रहते हुए भेजी होंगी | हर
बालिग़ होते बसंत के साथ उनको खोल कर मैं हर बार बस आधा पढता हूँ, की कहीं ये
तस्वीर ये कार्ड इस कार्ड में तुम और मैं मुक्कमल, न हो जाऊं, तुम्हे पता है
इस कार्ड की खासियत, हर बार मैं जब भी
इसे पढता हूँ , छूता हूँ , कुछ नया पाता हूँ इनमे | ये आधापन इनका इतना सुकून देता
है, जैसे बस पूरा होने की चाहत नहीं | पर चुपके चुपके तुम बालिग़ से पूरी हो रही हो
एक मासूम सर्दी से| जो बंसत को ढँक
देगी एक दिन |......... पर मैं आधा हूँ,
हमेशा तुम्हारे लिए
आधा तुम्हारा.............
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