ये तुम हो की मैं हूँ




ये तुम हो की मैं हूँ, मैं सोचता रहा तुम रोती रही होगी,पर मैं रोता रहा..............
उस दिन वहां चेहरा धोते हुए तुम कानों में बोलती धीमे धीमे दूर जाती रही,किसी स्टेशन से छूटती गाड़ी की तरह......ये तुम हो की मैं हूँ,... जो मुझसे बातें करती अब खिलखिलाती नहीं,



मुस्कुराती हो पर हर बात पर ज़रा ठहर जाती हो ......
कुछ फ़ीका फ़ीका सा हो गया है |जैसे नमक भाप बन कर उड़ सा गया हो........ये तुम हो की मैं हूँ, और ये बातें खत्म कैसे हो जातीं हैं अचानकजो पहले बिना थके बस चलती ही जाती थी......


तुम थक गए हो या मैं थका सा हूँ .... ये तुम हो की मैं हूँ,जो इस उम्मीद की सड़क पर तुम छोड़ कर जा रही हो...या तुम उम्मीद करती हो मुझसे की सड़क की अगली मोड़ से मैं वापस लौट जाऊं.....|
ये तुम हो की मैं हूँ ....जो बेरंग शाख से उड़ता हुआतुम्हारे कॉलर पर अटक गया है...,

और झटक देती हो तो तुम्हारे आस्तीनों में फंस जाता है |फिर हाथ झाड़ कर , इतनी बेरुखी से कुचलते हुए ...कितनी बेफिक्री से तुम आगे बढ़ जाती हो||||


और वहीँ कसमसाता हुआ मैं सोचता हूँ..ये तुम हो की मैं हूँ ..........
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