हर्फ़ उधर ले रहा हूँ


हर्फ़ उधार लिया है, तुम्हे लिखने के लिए |||   जैसे ......
तुम बातूनी, शिकायती, डरपोक, गुस्सैल, नासमझ पर मासूम और बस मेरी  
मै तुम्हे लिखता चला जा रहा हूँ |||||       और
तुम झल्लाती हुई, आगे बढ़ रही थी मै मुस्कुरा कर तुमको रोकता ||
तुम झटके से चलती जाती और थक कर एक तंग गली के मुहाने पर रुक जाती
फिर गुस्से में भी मुस्कुरा देती,
और मै तुम्हे लिखता चला जा रह हूँ |||
अगले बरस की सर्दी में जब तुम मेरे बदन पर हाथ सेंकती हो,
मैं खीज रहा हूँ, तुम खिलखिला रही हो ...
चारो तरफ पेड़ कोहासे से लिपटे पड़े हैं, तुम गर्म भाप बना रही हो.
और मै... तुम्हे लिखता चला जा रहा हूँ |||||||
धीरे धीरे अँधेरा बढ़ रहा है, बादल और उफनने लगे हैं,
उस छज्जे से होकर बूंदें और क़रीब आने लगीं हैं.....
बारिश मद्धम से तेज़ महसूस होने लगीं हैं ...
हमारे क़दमों की दूरी सिमटने लगी हैं ....
तुम्हारी सांसों की गर्माहट मुझे और छूती जा रही है
और मैं.......... तुम्हे लिखता चला जा रहा हूँ ||||||||
बरस दो चार बरस बीतें हैं, बीतने को हैं और
बीतते चले जा रहे हैं ...और मैं तुम्हे लिखता हूँ और लिखता...... चला जा रहा हूँ  
                                                                        तोहफा




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