मैं हूँ बसंत
मै हूँ बसंत, तुम सर्दी
मेरी
तुम पिली सरसों की बालियों
पर ओस बन कर छा जाती,
मै धूल बन कर सड़कों की ख़ाक
छानता ||||||
तुम पत्ते धो कर सुखा
रही, मै मुरझाए पत्ते लेकर उड़ जाऊंगा |
तुम सफ़ेद कोहरे से शाखों को
ढँक देना, मैं सुनहरे धूप में धीमे धीमे चलूँगा |
फिर धीरे धीरे मेरी सर्दी
जब तुम बालिग़ हो रही हो, यूं ख़ुश्क सी क्यूँ हो रही हो|
सफ़ेद सुबह, चटकती धूप,
रंगीन खेतों को बदरंग करने पर क्यूँ तुली हो |||
इतनी तेज़ी से जो तुम पिघल
रही हो, अब के बसंत तुम मेरी सर्दी तुम कहीं गुम हो रही हो |||
सुबह सुबह जब ओस बन कर, जब तुम
मेरी छाती पर गिर जाती थी ||| |और
मैं.....
रेत बन कर तुम्हे अपनी चादर
में लपेट लेता था|||||
तुम बर्फ बन कर मेरे गलों पर पिघलती थी, मैं
गर्म भाप से तुमको छेड़ा करता था ||
पर वो मासूम सर्दी और
खुशनुमा बसंत ज़रा चटख से गए हैं | अब के मौसम तुम
पत्तों से टपकती हुई वहीँ
सूख जाती हो
और मैं रेत सा सरकता हुआ इस पतझर सूखे झाड़ों में
जाकर दब जाऊंगा ||||
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