purani dayri

                
पुरानी डायरी 

किताबों के बीच दबी हुई ,गुबार से सनी हुई 
यादों कि धुंधली तस्वीरें आधी पिली आधी सफ़ेद ,
सफहों के बीच पड़े सूखे फूल ,फटी हुई रशीद ,पुराने किस्से और आंसुओं कि बूँद 
सब वहीँ थे जिस पर न जाने कब से रौशनी नहीं पड़ी थी ,
न जाने कब से सफहों पर हरकत नहीं हुई थी ,न जाने कब से स्याही कि बूँद नहीं छलकी थी .
उस पुरानी डायरी में कितने राज़, कितनी खली रातें और अधूरे ख्वाब बंद हैं .
कुछ लिखने के बाद काट दिए गए लफ्ज़ हैं,और भूल गए दोस्तों का ज़िक्र भी है .
शायद ज़िंदगी भी उसी पुरानी डायरी कि तरह है धुंधली ,पिली सफ़ेद और गुबार से सनी हुई .
जो गर्द कि चादर लपेटे बस वक़्त को देखती है न कहती है न बोलती है ......
महताब आलम

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