पिछले पन्नो से   

डायरी के पन्ने पलटते पलटते याद आया अभी पिछले दिनों कि ही तो बात है| यूँ कोई 4 साल पहले कि पूरा रुमानियत का हफ्ता चल रहा था| हर कोई इस विशेस हफ्ते में अपने किसी खास के लिय कुछ खास करने में लगा था,बाज़ार में रंगीन फूल मिल रहे थे,दुकाने रूई के खिलौनो और खुशबूदार इत्र से महक रहे थे| उपहारों और कपड़ो कि दुकाने भरी हुई थी| हर कोई किसी न किसी के साथ नज़र आता था,चेहरे पर मुस्कान समेटे, हाथ थामे,मोह्ब्बत फरमाते| उन दिनों कि याद ताज़ा होते ही कोई चेहरा मेरे भी आँखों के सामने घूम जाता है|  वैसे कुछ चंद दिनों का ज़िक्र मेरी डायरी में भी है,जिसमे कुछ घुमावदार रास्तों पर ढलते शाम के साथ चहल कदमी का ज़िक्र है|  कुछ टूटे फूटे गानो का ज़िक्र है|  और ज़िक्र है,एक उन्मद भाव का जिसका मतलब उन दिनों पता नहीं था, पर जिसका अहसास बेहद खुशनुमा था|  अगले पन्ने पर कुछ बिताये गए पलों का किस्सा और याद दिलाती तस्वीरों का संछिप्त लेखा जोखा था|  मेरा पतला धंसा हुआ चेहरा उसमे से झलक रहा था| पढ़कर धीरे धीरे चेहरे पर अब भी मुस्कान फैलने लगती है,सोचता हूँ वही वाले दिन अच्छे थे, नासमझी से भरे हुए, बेपरवाह और मोह्ब्बत से भरे हुए|  पर 4 साल बाद अब डायरी के साथ वक़्त भी काफी बदल गया है,न फुर्सत के लम्हे हैं,न रुमानियत न रंगीनियां ना भरोसा है| पर कुछ चीज़ें हैं जो वक़्त के साथ आ गयीं है, एक डर थोड़ी अक़ल व कैफियत और बहुत सारा खुद से समझौता है|   इस पूरे जद्दो जहद में रुमानियत का ये हफत्ता इतनी जल्दी कैसे पलट कर रुखा हो गाय है|  4 साल में मोह्ब्बत कि शाम ऐसे ढली कि अब तो कागज़ पर स्याही भी नहीं उभरती है| इस दूसरी डायरी का रंग तो चमकदार है,पर इस पर स्याही बड़ी फीकी लगती है| कुल 4 साल का हाल अगर ऐसा है, तो क्या पूरी ज़िंदगी ढलते ढलते और भी बेज़ार हो जायगी |

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