बिसात पर मै

बिसात बिछ चुकी है ,और मै खुद मोहरा हूँ 
सामने मोहरों कि फ़ौज हर लम्हा नज़र रखे हुए ऐसे देखती है 
मनो हर चल पर मुझे चित कर देगी 
मै एक मामूली सा किस्ती सिर्फ 
कदम भर आगे बढ़ने कि हिम्मत रखता हूँ ,
जहाँ कोई घोड़ा या ऊँट कब रौंद जाये पता नहीं ,
फिर भी आगे बढ़ता शायद इसलिय 
सिवा आगे बढ़ने के कोई और सूरत भी नहीं 
गर,होती तो बेशक कदम पीछे खिंच लिया होत
और चाल दुरुस्त करता,
पर पीछे से बिसात पर मेरे जात के मुहरे भी तो
बिखर कर शक्ल बिगाड़ चुके हैं ,
खाने ख़ाली हो गए मुहरे रौंद दिए गए हैं.
इमारती फौजें ढह कर मुठी भर रह गयीं
फिर भी बिसात पर टिका मै लड़ता हूँ
जहाँ आगे बढ़ कर
सिर्फ फ़ना होने कि सूरत है |
महताब आलम .....

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