भला हो अंग्रेज़ों का
कभी कभी भड़काऊ अंग्रेजी शब्द सुनते ही अन्यस ही मुँह से निकल जाता है,अँगरेज़ चले गए पर अंग्रेजी छोड़ गए |पर ज़रा गौर से सोचिये उन्होंने हम पर कितनी मेहरबानी कि है|अगर वो न होते तो शायद हम सिर्फ उच्चारण के डर से न तो आधे खेल खेल सकते,न ही आधे चीज़ों का उपयोग करते |
मान लीजिये हमें मामूली सी माचिस ही लेनी पड़ती तो हम माचिस के बजाय अग्नि उत्पादक पेटी मांगते,बच्चे टेबल टेनिस के बजाय अष्ठकोणी काष्ठ फलक पे ले टकाटक दे टकाटक खेलते या लॉन टेनिस के बदले हरित घांस पर ले तड़ातड़ दे तड़ातड़ खेलते |तो सोचिये जिसके उच्चारण में ही हमारी आधी ऊर्जा वयर्थ हो जाती तो हम भला खेलते क्या |ऐसे में तो अंग्रेज़ो ने अपनी अंग्रेज़ियत थोप कर बड़ा ही उपकार किया है ,वरना हमारी क्रिकेट टीम यानि गोलगुट्टम लक्क्ड़ फट्टम दे दनादन ले दनादन प्रतियोगिता दल न तो अन्तरास्ट्रिय स्तर पर पहुँचती न ही अँगरेज़ या अपने देश वासी ही इसका पूरा अर्थ समझा पाते और समझाते भी तो तीन चार गेंदे अवस्य ही फेंकी जा चुकी होती |
खैर छोड़िये सबसे बड़ी समस्या तो ऑफिस माफ़ किजिएगा कार्यालय में होती जहाँ हम टाई के उपयोग के बदले कंठ लंगोट एवं बटन के बदले अस्त वयस्त वस्त्र नियंत्रक का उपयोग करते |
अंग्रेजी के इन शब्दो ने हमारा जीवन इस प्रकार सरल बनाया है |फिर भी हम न जानें क्यूँ
अंग्रेजी के पीछे हाथ धो कर पड़े हैं |जिस चाय के नुक्कड़ पर बैठ कर हम अंग्रेजी के तेज़ी से फैलते मायाजाल कि चर्चा चुस्की भर भर कर करते हैं उस चाय को अगर दुग्ध जल मिश्रित शर्करा युक्त पर्वतीय बूटी कह कर पुकारना पड़ता तो बहुत से लोग शब्दोच्चारण के भय से इसका उपयोग ही न करते |न ही मच्छर के काटने से कहने कि जोहमत उठा पाते कि उसे किसी गुंजनहारी मानव रक्त पिपासु जीव ने काट खाया है |कहा जय तो आधे समय मौन धारण ही किये रहते वो तो भला हो अंग्रेज़ो का .....
महताब आलम

Bakwaaaaaas
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