वो रात समेटनी हैं

वो रात समेटनी हैं , देखो कैसे औंधे मुंह पलंग पर पड़ी हुई है।
वो गीला तौलिया समेटना है, आईने पर लिखे हुए लफ्ज़ समेटने हैं।
दीवार पर पड़े हुए हाथों के निशान भी तो समेटने हैं।
और वो पड़ा हुआ खाली डब्बा जिसमें यादें भरी हुईं हैं ,
सामने जलती बुझती बल्ब की रौशनी , और उनमें मेरी तरफ घूरता हुआ तुम्हारा चेहरा ।
तकिये का फटा हुआ कोना , बची हुई सिगरेट की बड ।
डायरी का फटा हुआ पन्ना, ओह देखो चिप्स की खाली पैकेट सब समेटना है ।
आधा चाँद, जाग कर बिताई हुई पूरी रात , हल्की हल्की ठंड वाली दोपहर, रौशनी अंधेरा शाम सुबह धूप छांव छुवन
सिरहन सूखा गीला आधा पूरा सब समेट लूँगा।
आखिर तुम्हारी ज़िन्दगी से जो जा रहा हूँ।।

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