शहर..

टूट के आ रहा हूँ , छूट के आ रहा हूँ ,
    ऐ शहर देख मैं तुझसे कैसे फूट के आ रहा हूँ |

हज़ार उम्मीदों से ,  नीरस गीतों से, सूखे झरनों से,
     टूटे हुए डाल से, भरे हुए थाल से,

सोच के फकीरों से, हाथ के लकीरों से ,
                मैं कैसे छूट के आ रहा हूँ

   ऐ शहर देख मैं तुझसे कैसे फूट के आ रहा हूँ |
             रिश्तों की डोर से , वीरान सड़क के मोड़ से,

 खाली खाली हाथ से, न जाने कितने लोगों के साथ से ,
                खुद को लूट के आ रहा हूँ ,

 ऐ शहर देख मैं तुझसे कैसे फूट के आ रहा हूँ
              दुह्रावे के चक्र से , समझदारी के वक्र से ,

नशे में चूर , सपनों का फ़ितूर , एक आवारा विचार , अँधेरे पे सवार
               एक तारा हूँ , जो टूट के आ रहा हूँ ,

    ऐ शहर देख मैं तुझसे कैसे फूट के आ रहा हूँ  |

                                                                           महताब आलम

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट