ख़र्च



खर्च करूँ भी तो कहाँ करूँ...


पर खर्च करूँ भी तो कहाँ करूँ...

अपने कमीज़ की बनावट खर्च करनी थी , टाँके गए बटन की सजावट खर्च करनी थी |

तुमसे अपने बदन की हर चीज़ का दिखावा खर्च करना था , हर अहसास खर्च करना था


जो मैंने उस दिन एक छुट्टी ली थी दफ्तर से उसको खर्च करना था, सुबह टहलते जाते हुए

कुछ बातें खर्च करनी थी |

पर खर्च करूँ भी तो कहाँ करूँ...

पैसे नहीं हैं बस कुछ वक्त बांकी है, खर्च करने के लिय , जैसे कुछ तस्वीर है , एक इतवार भी पड़ा हुआ है , शाम का थोडा अकेलापन पन है , और कुछ ख़त हैं जिनका पता बांकी है खर्च करने के लिय


पर खर्च करूँ भी तो कहाँ करूँ...

एक रोज़ तुम्हारे साथ खर्च करना चाहता हूँ , पीपल के पेड़ के पास वाले खोमचे पर तीखी चाट खाते हुए बर्फ के गोले की घूंट भरते हुए ,पैदल मीलों तुम्हारे साथ ,


सड़क की दूसरी तरफ तक तुम्हारा हाँथ पकड़ कर चलना चाहता हूँ , गुनगुनाते हुए तुम्हरे साथ धीमे धीमे जो सिर्फ मैं सुनूंगा और एक सांस की लौ पर चलता चलूँगा | बस एक ऐसा दिन खर्च करना चाहता हूँ |

जहाँ मैं और तुम नर्म धूम में किसी बेंच पर अपने किस्से बाँच रहे होंगे , वहां बेफिक्री की हवा हमें छू कर जाती होगी मैं उन खर्चों से पूरा महिना गुज़र लेता .................


पर खर्च करूँ भी तो कहा करूँ |






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