चल कहीं सांस लेकर आते हैं।
चल कहीं सांस लेकर आते हैं |हाँ इस दुनिया से दूर रोज़ की जिंदगी की दीवार के उस पार,
खुले हुए नीले आसमान के साए से, धीरे धीरे चलती हवाओं के शोर से ,
दूर तलक बहती नदियों से, ऊँचे पहाड़ के दुसरे तरफ से,
कुछ खास लेकर आते हैं,
चल कहीं सांस लेकर आते हैं |
चल वहां जहाँ वक़्त ठहरा हुआ होगा, जहा हर दिन अपनी खुशियों के मुताबिक गुज़रता होगा |
जहाँ किसी मिन्नत की जरुरत नहीं पड़ती होगी,
जहाँ कोई उम्मीद नहीं रखता होगा , जहाँ हर पल मेरी ख़ुशी
मुशकुराती होगी ,
उस पल को पास लेकर आते हैं ,
चल कहीं सांस लेकर आते हैं |
वहां शायद हर दिन बदला हुआ हो ,
वहां मेरी उम्र, मेरी समझदारी को परे रखा जाता हो |
वहां जिमीदारियों के बोझ को पीठ से उतर दिया जाता हो ,
वहां शायद थोड़ी थोड़ी खुशियों का भी पूरा हक़ दिया जाता हो |
चल उस आस को लेकर आते हैं
चल कहीं सांस लेकर आते हैं |
कल रोजाना के चक्र में फंसने से पहले , एक दौड़ लगा कर अपने सपनों की पतँग को ,
आसमान में ऊँचा उठा कर , एक रहत भरी काश तोड़ कर लाते है ,
चल कहीं सांस लेकर आते हैं |
Mahtab alam

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