तुम कहाँ हो...........
गरजते बादल के साथ रिमझिम फुहार ,
चेहरे को फिर ताज़ा करने आयी है|
सावन का चक्र खुद को दुहराता
सामने फिर खड़ा है |
मै टेक लगाये वहीँ बैठा हूँ,
हरे घांस पर बारिश कि बूँदें जमी हुई
धुल जड़े पेड़ और पत्तियां धूल गयीं
फिर झुरमुट किनारे बारिश कि खनखनाहट
और टहनियों से टपकती बूँदें ,
सब तुम्हारी याद दिलाती है |
गुज़रे वक़्त के सावन से कितना अलग कितना नीरस
तुम्हारे बिना कितना अधूरा
खिलखिलाती बूँदें भी अब मुस्कुराना भूल गयीं ,
वहीँ सामने, पत्थर पर जमी काई
बीते वक़्त और फासले कि गवाही है ,
साखों से छन कर आती रौशनी शाम ढाल जाने का अंदेशा तो है पर ,
मेरे बगल में कोई नहीं जो याद दिल सके
पगडंडियां थोड़ी और छोटी हो गयीं
क्यूंकि मैं अकेला ही इस पर चलता हूँ ,
सरसराती हवाएं और ये सब
अकेला देख मुझसे पूछती हैं ,
तुम कहाँ हो
क्या बताऊँ इन्हे
तुम कहाँ हो |
महताब आलम
चेहरे को फिर ताज़ा करने आयी है|
सावन का चक्र खुद को दुहराता
सामने फिर खड़ा है |
मै टेक लगाये वहीँ बैठा हूँ,
हरे घांस पर बारिश कि बूँदें जमी हुई
धुल जड़े पेड़ और पत्तियां धूल गयीं
फिर झुरमुट किनारे बारिश कि खनखनाहट
और टहनियों से टपकती बूँदें ,
सब तुम्हारी याद दिलाती है |
गुज़रे वक़्त के सावन से कितना अलग कितना नीरस
तुम्हारे बिना कितना अधूरा
खिलखिलाती बूँदें भी अब मुस्कुराना भूल गयीं ,
वहीँ सामने, पत्थर पर जमी काई
बीते वक़्त और फासले कि गवाही है ,
साखों से छन कर आती रौशनी शाम ढाल जाने का अंदेशा तो है पर ,
मेरे बगल में कोई नहीं जो याद दिल सके
पगडंडियां थोड़ी और छोटी हो गयीं
क्यूंकि मैं अकेला ही इस पर चलता हूँ ,
सरसराती हवाएं और ये सब
अकेला देख मुझसे पूछती हैं ,
तुम कहाँ हो
क्या बताऊँ इन्हे
तुम कहाँ हो |
महताब आलम

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