वो एक पुराना रेडियो था , कहीं कहीं से टूटा हुआ, कहीं कहीं से बदरंग हिलते पुर्ज़े और तार तार सा। कई दिनों से ग़ुबार में अंटा हुआ बेहद  ख़ामोश बेबस तख़्त पर पड़ा हुआ, पुराने टॉर्च बैटरियों और जर्दे की पुरानी डब्बों के बीच किसी की छुवन और
किसी सिरहन को तलाशता हुआ मायूस और बेरौनक आँखें मूंदे अपने वक़्त के इंतज़ार में था। पर जैसे के उठ कर अचानक कहने लगा उस वक़्त को दोबारा जीना चाहता हूँ। न जाने कौन सा लगाव रहा है, इसकी घर्र घर्र में की आज सारे पुर्जे ठीक कर रहा हूँ, हर तार बड़ी शिद्दत से जोड़ रहा हूँ,प्लास्टिल के डब्बे में एक ख़्वाब ढून्ढ रहा हूँ। ढूंढते हुए कुछ किस्से मिले हैं, कुछ नायाब लोग मिले हैं, कुछ पुराने गाने मिले हैं सब को नया कर रहा हूँ उस रेडियो को जिंदा कर रहा हूँ । पुराने टॉर्च की थोड़ी ठीक बैटरी को जैसे तैसे सटे हुए पुर्जों के साथ फिट किया है, उसकी सतहों से धूल साफ़ की है और उसका काला रंग खिल गया है, हर तार को उसके मुश्किल से संभाला है और आवाज़ बुलंद कर दिया है। जैसे कोई गाना चल रहा हो और हम सब साथ में गा रहें हो थोड़ी सकपकयि सी और थोड़ी कमजोर सी वो अब चल रही है जैसे के मैं चल रहा हूँ ,वो स्टेशन घिस घिस कर बज रहा है, जैसे की मैं । आँखे मूंद कर मैं वो वक़्त जीने लगा हूँ , और घिस रहा हूँ घिस रहा हूँ , रात को छत के मुंडेर पर रखा हुआ एक वक़्त सामने से जा रहा है , कई जाने पहचाने लोगो की आवाजें आ रहीं है जिनकी शक़्लें नहीं हैं, और मेरा ख़्वाब भी धीरे धीरे गुजर रहा है, एक रेडियो और एक रेडियो आर्टिस्ट दोनों उसी तख़्त पर हैं जहाँ से वो आज या कल कही कबाड़ वाले के यहाँ बेच दिए जायेंगे खैर अब रेडियों की आवाज़ थरथराने लगी है, इसकी आवाज़ कमज़ोर और बूढ़ी है, और ये कांपती हुई आवाज़ मुझे कह रही है तुम जिसने इस पर से धूल हटाया है इसकी आवाज़ बन जाओ तुम हमेशा मुझ में जियो तुम मेरी आवाज़ बन जाओ।।

                             महताब आलम

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