समोसे नहीं खाता।।।

 काफ़ी फिट रहता हूँ........ मैं समोसे नहीं खाता हूं।।।
पंद्रह साल पहले हम जैसे तैसे चिल्लर जुटाते .... और हमेशा उसी स्टेशन वाली दुकान पर जाते ।।।।
तब ऐसे सड़कों पर हर जगह मोमोज़, बर्गर नहीं मिलते ..... लोग घर के लिए गर्म समोसे ही पैक कराते ।।।।
लोहे के घोड़े पर सवार शहर को इस कोने से उस कोने तक नाप कर....... कहाँ कैसी स्थिति है, पूरी तरह भांप कर।।।
न गुटखा, न बीड़ी, न तम्बाकू जैसी कोई लत थी.........बस उसी दुकान के समोसे और नमकीन चटनी की आदत थी।।।
साहब...... तब वो दस में चार आता ...............पर हालत ऐसी की देखो मैं वो दस रुपये भी नहीं जुटा पाता।।।।।
फ़िर हम सब्ज़ी में से एक-एक रुपया बचा कर ले जाते...... पंचर टायर में भी हवा डाल कर
 उसकी आख़िरी सांस तक चलाते और आखिर कार अपने गंतव्य तक पहुँच जाते।।।।।
उन मेहनत और बचत के पैसों में प्रेम से समोसे खाते।।।।।उसकी सुनते अपने सुनाते बिना जिझक ज़ोर के ठहाके लगाते।।।।।।।
उस वक़्त उतने पैसे नहीं होते थे, न बचाने को, न उड़ाने को, और न ही खाने को पर हां..... इंसान होते थे, इंसान होते थे........हर कदम पर साथ निभाने को।।।।।।।।।।।।
गली से लेकर स्कूल तक, हर छोटी बड़ी भूल तक।।।।।तब हम एक कौम थे....... 15 बरस की उम्र थी थोड़े नासमझ थे, थोड़े मासूम थे।।।।
तब समोसा ही दावत थी, समोसा ही शराब और समोसे की तोड़ ज़ोर में हमारा पूरा हिसाब।।।।।
ख़ैर......अब हम मिल नही पाते हैं।।।।।।। अक्सर हम छुट्टी और काम के बीच फंस जातें है।।।।
और वैसे भी लोग तो बस समोसा को समोसा जानते हैं, हमारी तरह कहाँ कोई समोसे को मोहब्बत मानते हैं।।।
इसलिये वो पूछते हैं, तो मुस्कुराते हुए उनसे कह देता हूँ।।।।
काफ़ी फ़िट रहता हूँ......मैं समोसे नहीं खाता हूं।।।।



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