कुछ कड़े शब्दों के साथ मेरी डिग्री पूरी हुई, उन्होंने कहा के आज से तुम्हे हर गलती की सजा मिलेगी और तुम्हारा लापरवाह और ढीलाढाला  रवैय्या भी बाहरी परिवेश में नहीं चलेगा | उनकी बात भी बहुत हद्द तक ठीक लगी| हर काम को टालते रहना और जीने का बेतरतीब ढंग यही तो लापरवाही है| रात काफी देर तक करवट बदलते बदलते सोच रहा था अपने में इतना बड़ा बदलाव इतनी जल्दी कैसे ला सकूंगा| फिर उनकी बात याद आई की जीवन में एक समय के बाद गंभीर हो जाना चाहिए,क्या चुप रहना,नियमो का पालन करना,ख़ुश नहीं बल्कि सिर्फ मुस्कुराते रहना, अच्छे लोगों यानि के जिन्हे ऐसा समझा जाता है से बाते करना,कम बोलना, बेवक़्त भी पढ़ाई करना, यही गंभीरता है,या इसकी कोई और भी परिभाषा है|  पर इन कुछ 5 सालोँ में अपने इसी छवि के लिए पहचाना जाने लगा हूँ| जिसे कुछ लोग बेवाक कहते है, कुछ बद्तमीज़ और कुछ सिर्फ अपनी भवों को ऊपर कर सर हिलाते हुए इशारा करते हैं| हाँ शायद शब्दों पर नियंत्रण रखे बिना कई बार ज्यादा बोल देता हूँ ,कुछ नासमझी भी कर देता हूँ, कई बार अपने काम दुसरो के मथ्थे मढ़ देता हूँ जो बेशक लोगों को मुझे उस तरह देखने पर मजबूर कर देता है| मैं ये तो नहीं कह सकता की 2 दिन में ही अपनी छवि के विपरीत हो जाऊंगा पर हाँ कोशिश ज़रूर करूंगा |
                                                                                             
                                                                                                            महताब आलम 

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