तो क्या बात हो....................


वो सुरीली धुन कोई छेड़ जाए तो क्या बात हो

उसके साथ फिर हाथों में हाथ हो.......... तो क्या बात हो


बड़ी मुश्किल से मिली थी वो घड़ियाँ

वो वक़्त फिर से लौट आये


तो क्या बात हो





बड़ी बेज़ार सी हो गयी है ज़िंदगी आज कल

जिन रास्तों पर छोड़ गए थे हमको

उन्ही रास्तों से वो लौट आये


तो क्या बात हो



खामोश रातों में सिर्फ सन्नाटों का शोर है,

दूर तलक कोई रौशनी भी नहीं है,

इन अँधेरे सन्नाटों को चीड़ कर

कोई जुगनू आये


तो क्या बात हो




सफ़ेद हो रहे इन बालों से अब वक़्त झलकता है

चहरे पर कि झुर्रीयिों से कबाहत

पर नींद कि चटाईआं जब तकिये पर सिमटती है.


तो सोचता हूँ

कोई चेहरे पर अपनी जुल्फें फैलाए ............तो क्या बात हो


एक अर्शा बीत गया है

के तस्वीर भी धीरे धीरे पड़ गयी है

काँपते थरथराते होटों को न जानें

कितना वक़्त मुस्कुराते हुआ

अब सुबह नंगे घाँस पर चादर लपेटे

चलत हूँ तो लगता है

पीछे से फिर कोई मेरा नाम दुहराये


तो क्या बात हो




महताब आलम

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