तुम देखना
तुम देखना टूटे हुए
बालों के टुकड़े बिखरे हुए हैं वहीँ,
कोई चप्पल का निशान भी बाकि रह गया है,
एक टुकड़ा कपड़े का वो
लटक रहा है, पुरानी शाल अब भी बिछाये रखी है,
परदे से होकर रौशनी फर्श पर रौशनी रोज़ पड़ती है
खिडकियों का एक
पल्ला अब भी खुला है
तुम देखना जो तुमने छुवा था, सब सहेज कर रखे
हैं
तुम महसूस करना
तुम्हरी खुशबू, खुले बालों से टपकते पानी की बूंदों के
एक कागज़ तुम्हारा फेंका हुआ, तुम्हारी
छन-छन
तुम्हारा गुस्सा,
कभी कभी रूठना, हँसना, चीखना
सब वहीँ पड़े है उस कमरे में तुम देखना
|
और फैला है तुम्हारे
यादों का चादर
सामने रैक पर सिमटी हुई सी बस तुम
ही तुम हो
पर भीगा हुआ वो
तौलिया अब सूख गया है, बदला नहीं है,
ये कमरा तुम्हे पहचान लेगा, तुम देखना |
महताब आलम

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