मैं हूँ तुम हो ||||||||||||||||||||||

मेज़ पर फैले कुछ टुकड़े,एक डिबिया माचिस की और दोनों तरफ
    मैं हूँ तुम हो |
हँसते हुए कुछ लम्हे कैद हैँ उन टुकड़ों मैं,उस माचिस की डिबिया में और वहां
   मैं हूँ तुम हो |
एक सपना है वहीँ पड़ा हुआ उस दस्तरखान के निचे दबा हुआ जो  कहतीं हैं
   मैं हूँ तुम हो |
काजल से लिपटी शरारती ऑंखें बार बार घूरती हुई रूठ जाती हैं,
कभी झुकती हैं कभी उठती हैं वो बेचैन हैँ जैसे
    मैं हूँ तुम हो |
दोने मैं रखा पानी, वो उस तरफ पड़ा मिर्च,ख़ाली टोकड़ी शीशे का ग्लासःसब
सहेजे हैँ वैसे ही जैसे साथ मैं
    मैं हूँ तुम हो |
  वो सब अब भी बातें करते हैँ मुझसे अक्सर तुम्हारे बारे मैं पूछते हैँ
देखो न कितने नादान हैँ आओ न मिल लो उनसे एक दफा
मेज़ पर बैठे शीशे के ग्लासः से फिर तुम झांकना जहाँ एक तरफ
  मैं हूँ तुम हो |

                   
                                                                         तुम्हारे लिए मेरी कलम से

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