इस्लाम, कट्टरवाद,आतंकवाद ,पाकिस्तान और ऐसे ही कुछ और लफ्ज़ अचानक से इस्लाम के बारे में सोचने से ज़ेहन में उभरने लगते हैं| लम्बी दाढ़ी गुस्सैल आँखें और कट्टरवादी सोच एक मुस्लमान का चित्र सबसे पहले दिमाग में कुछ ऐसा ही तो बनता है| न जाने क्यों बनता है पर ऐसा ही बनता है| एक अल्पसंख्यक समुदाय के तौर पर इस्लाम की स्थिति को अगर धोबी का गधा कहा जाये तो कोई बुराई नहीं है| कहा जा रहा है तीसरे विश्व्युध की तैयारी शुरू हो चुकी है| यूरोप और यहूदियों के बाद अब बारी इस्लाम की है| इस बार फर्क सिर्फ इतना है की तबाही का ज़िम्मा इंटरनेट को दिया गया है| बुद्धिजीवियों का अहम मुद्दा अचानक से इस्लाम बन गया है| पेरिस में हाल ही में हुए हमले के बाद वैस्विक स्तर पर भी इस्लाम की छवि बिगड़ती नज़र आ रही है| लोग इस्लाम को लेकर धारणा बनाने लगे हैं| मुस्लिम युवा दोराहे पर हैं,और इस्लाम संकट में| पर सरकार अगर चाहे तो उन्हें इस संकट से निकल सकती हैं| मुस्लिम जागरूकता अभियान चला कर या उनकी अशिक्षा दूर कर| कहा जा रहा हैं इस्लाम नए लोकतंत्र से तालमेल नहीं बिठा पा रही हैं| सवाल हैं क्यों नहीं बिठा पा रही हैं,या फिर एक और तबका हैं जो उन्हें सरकार के विरोध में भड़का रहा हैं, या फिर दोनों बातें हो रही हैं| एक सामान्य सोच के अनुसार किसी को भी कहते हुए सुना जा सकता हैं इस्लाम आंतकवाद पैदा करता हैं| कईयों का कहना हैं इस्लाम की सोच ही आतंकवाद से बुनी हुई हैं| सच में ऐसा हैं क्या या कोई आपके दिमाग में भी ऐसा ठूंस रहा हैं इस्लाम के खिलाफ या हो सकता हैं ये भी किसी रणनीति का हिस्सा हो| आगे आने वाले दिनों में ये इस्लाम के लिए एक बड़ा खतरा हैं| भारत में एक दक्षिणपंथी कट्टरवादी सोच की सरकार की वज़ह से हिन्दू हाल के दिनों में ज्यादा उग्र हो गए हैं, जिससे टकराव की स्थिति पैदा होने लगी हैं| हिन्दू चरमपंथी भारतीय मुसलमानो को पाकिस्तान और isis जुड़ कर देखते हैं नतीजा दोनों तरफ नफरत की स्थिति बढ़ने लगी हैं| पेशावर हो या पेरिस हर तरफ चरमपंथी का धर्म चाहे जो भी बेसक वो इंसानियत का धर्म नहीं था| एक समुदाय विशेस पर सवाल उठा देना या उसको इसके लिय दोसी ठहराना महज़ एक मानसिक विकलांगता जिसका खामियाज़ा आने वाले दिन में इस्लाम को ही भुगतना पड़ेगा| चरमपंथ और आतंक से ऊपर उठ कर अगर सारे लोग इंसानियत और विकाश की बात करें तो बेशक हम इस्लाम को बचा सकते हैं और तरक्की के आकाश पर भी पहुंच सकते हैं|अंततः रंगभेद और जातिवाद के तरह ही इस्लामवाद जैसी सोच को ब्बी हम खत्म कर पायंगे इस्लाम के रहते ये कहा तो नहीं जा सकता पर हम इसके लिए सोच ज़रूर सकते हैं|
मेरी कलम से। …।
मेरी कलम से। …।

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